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मन्त्रमार्तण्ड

पुरुषसूक्तषडङ्गन्यास:

ॐ यत्पुरु॑षं॒ व्यद॑धुः कति॒धा व्य॑कल्पयन्।
मुखं॒ किम॑स्य॒ कौ बा॒हू का ऊ॒रू पादा᳚ उच्येते।।
अङ्गुष्ठाभ्यां नम:।।

ॐ ब्रा॒ह्म॒णो᳚ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा᳚ज॒न्य॑: कृ॒तः।
ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्य॑: प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत।।
तर्जनीभ्यां नम:।।

ॐ च॒न्द्रमा॒ मन॑सो जा॒तश्चक्षो॒: सूर्यो᳚ अजायत।
मुखा॒दिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ प्रा॒णाद्वा॒युर॑जायत।।
मध्यमाभ्यां नम:।।

ॐ नाभ्या᳚ आसीद॒न्तरि॑क्षं शी॒र्ष्णो द्यौः सम॑वर्तत।
प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिश॒: श्रोत्रा॒त्तथा᳚ लो॒काँ अ॑कल्पयन्।।
अनामिकाभ्यां नम:।।

ॐ स॒प्तास्या᳚सन्परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिध॑: कृ॒ताः।
दे॒वा यद्य॒ज्ञं त᳚न्वा॒ना अब॑ध्न॒न्पुरु॑षं प॒शुम्।।
कनिष्ठिकाभ्यां नम:।।

ॐ य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वास्तानि॒ धर्मा᳚णि प्रथ॒मान्या᳚सन्।
ते ह॒ नाकं᳚ महि॒मान॑: सचन्त॒ यत्र॒ पूर्वे᳚ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः।।
करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।।

ॐ यत्पुरु॑षं॒ व्यद॑धुः कति॒धा व्य॑कल्पयन्।
मुखं॒ किम॑स्य॒ कौ बा॒हू का ऊ॒रू पादा᳚ उच्येते।।
हृदयाय नम:।।

ॐ ब्रा॒ह्म॒णो᳚ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा᳚ज॒न्य॑: कृ॒तः।
ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्य॑: प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत।।
शिरसे स्वाहा।।

ॐ च॒न्द्रमा॒ मन॑सो जा॒तश्चक्षो॒: सूर्यो᳚ अजायत।
मुखा॒दिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ प्रा॒णाद्वा॒युर॑जायत।।
शिखायै वषट्‌।।

ॐ नाभ्या᳚ आसीद॒न्तरि॑क्षं शी॒र्ष्णो द्यौः सम॑वर्तत।
प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिश॒: श्रोत्रा॒त्तथा᳚ लो॒काँ अ॑कल्पयन्।।
कवचाय हुम्‌।।

ॐ स॒प्तास्या᳚सन्परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिध॑: कृ॒ताः।
दे॒वा यद्य॒ज्ञं त᳚न्वा॒ना अब॑ध्न॒न्पुरु॑षं प॒शुम्।।
नेत्रत्रयाय वौषट्‌।।

ॐ य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वास्तानि॒ धर्मा᳚णि प्रथ॒मान्या᳚सन्।
ते ह॒ नाकं᳚ महि॒मान॑: सचन्त॒ यत्र॒ पूर्वे᳚ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः।।
अस्त्राय फट्‌।।

महामंत्र

श्री भक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम श्रीमद्राजाधिराज योगिमहाराज त्रिभुवनानंद अद्वैत अभेद निरंजन निर्गुण निरालंब परिपूर्ण सदोदित सकलमतसस्थापित श्री सद्गुरु माणिकप्रभु महाराज की जय!

 

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