भुजङ्गाष्टकस्तोत्रम्

महादण्डहस्तं महादेवनाथं नृसिंहेन युक्तं नृरूपं गिरीशम्।
बृहत् ब्रह्मरूपं ह्यरूपं सुरूपं भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।१।।

अनेकैश्च शिष्यैर्युतं लोकनाथं सदा सिद्धिदं सिद्धदेवैकवन्द्यम्।
अवेद्यं सुवेद्यं निरीहं जनेशं भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।२।।

महान्तं महत्सृष्टिकर्तारमीशं महेन्द्रादिवन्द्यं महाकालरूपम्।
सदानन्दरूपं च वेद्यं सुवेद्यं भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।३।।

महामन्त्रहन्त्रे महत्कार्यकर्त्रे महद्रूपधर्त्रेमहत्पुण्यदात्रे।
नमः स्तव्यमानाय तस्मै सुवेद्यं भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।४।।

मखादिक्रियापाककर्त्रे विकर्त्रे निजानन्दसन्दोहसिन्धौ विहर्त्रे।
नमो दीननाथाय मालाधराय भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।५।।

अनेकार्तिहन्त्रे सुसौख्यादिकर्त्रे रमादेविभर्त्रे कुशैलादिधर्त्रे।
नमो दीनपालाय माणिक्यनाम्ने भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।६।।

अनेकानि तीर्थानि यत्पादपद्मे महाब्जं सुवर्णं च यन्नाभिपद्मे।
नमो माणिकायाप्रमेयाय तस्मै भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।७।।

सदा योगयागादिसाफल्यकर्त्रे सदा छात्रवर्णादिपालाय तस्मै।
नमो वै अरूपाय सर्वात्मकाय भजेऽहं सदा माणिकाख्यं सुरेशम्।।८।।

अहो प्रत्यहं स्तोत्रमेतत्सुदिव्यं त्रिकालं पठेद्यस्तु सौख्यं लभेद्वै।
भवेत्तस्य तुष्टो हि माणिक्यदेवो महासङ्कटादुद्धरिष्यत्यमुं वै।।९।।

इति श्रीमन्माणिकानुजनृसिंहतनुजमनोहरमुनिवर्यविरचितं भुजङ्गाष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

महामंत्र

श्री भक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम श्रीमद्राजाधिराज योगिमहाराज त्रिभुवनानंद अद्वैत अभेद निरंजन निर्गुण निरालंब परिपूर्ण सदोदित सकलमतसस्थापित श्री सद्गुरु माणिकप्रभु महाराज की जय!

 

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