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श्रीमाणिकअष्टोत्तरशतनामावलि:

01 ॐ श्रीमन्माणिक्यगुरुराजाय नम:
श्रीमान् एवं गुरुओं में सर्वश्रेष्ठ ऐसे माणिकप्रभु के प्रति नमस्कार है।
02 ॐ चिदानन्दमयाय नम:
चैतन्य एवं आनंद से परिपूर्ण श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
03 ॐ अव्ययाय नम:
शाश्वत एवं अविनाशी श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
04 ॐ कामितार्थतरुबीजाय नम:
इच्छित फल की प्राप्तिकरवानेवाले वृक्ष (कल्पद्रुम) के बीजभूत श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
05 ॐ सोमशेखरमूर्ध्निधृते नम:
जिनके सिर पर चंद्र शोभायमान है ऐसे भगवान् शंकर को जिन्होंने अपने मस्तक पर धारण कर रखा है (पूज्य माना है), ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
06 ॐ स्वामिने नम:
समस्त जगत् के स्वामी श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
07 ॐ सत्ताकृतये नम:
सत्ता अर्थात् अस्तित्व के कारणरूप अथवा अस्तित्व की आकृतिरूप श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
08 ॐ विदुषे नम:
विद्वान् श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
09 ॐ साधुसन्तानपादुकाय नम:
साधु-सज्जनों का अनुसरण करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
10 ॐ अनाद्यविद्याविच्छेदधृतमंगलविग्रहाय नम:
जिसका कोई प्रारंभ नहीं है ऐसी अज्ञानरूपी माया के विनाश के लिए जिन्होंने मंगलमय शरीर धारण किया है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
11 ॐ कलिकल्मषदुष्पंकध्वंसग्रीष्ममरीचिमते नम:
कलियुग के पापरूपी गंदे कीचड़ को सर्वथा सुखादेनेवाले ग्रीष्मऋतु के सूर्य के समान श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
12 ॐ करुणाकरनिष्पंदकल्पितानेकवैभवाय नम:
जो करुणा के सागर हैं और जिन्होंने केवल अपनी कल्पना मात्र से अनेक प्रकार के वैभवों का निर्माण किया है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
13 ॐ सकलाम्नायसन्दोहकंजातवनहंसकाय नम:
समस्त वेदों के समूहरूपी कमलसमुदाय में छोटे से हंस के समान शोभायमान श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
14 ॐ निगमागमपाथोदनिस्तारमरुदात्मजाय नम:
वेदरूपी समुद्र को पार करने में हनुमानजी के समान सामर्थ्यशाली श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
15 ॐ भक्तकामितसस्यौघप्रावृण्णीरदवीक्षणाय नम:
जिनकी दृष्टि भक्तों की इच्छारूपी फसलों के समुदाय के लिए वर्षाकालीन मेघ के समान है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
16 ॐ कामादिरिपुमत्तेभकेसरिणे नम:
कामक्रोधादि षड्रिपुरूपी मस्त हाथी जिससे घबराते हैं, ऐसे सिंह के समान श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
17 ॐ कुलपावनाय नम:
कुल को पवित्र करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
18 ॐ निजवीक्षालवोद्धूतप्रजाधिव्याधिसंचयाय नम:
जिन्होंने अपने कृपाकटाक्ष मात्र से सामान्य जनों की मानसिक एवं शारीरिक व्यथाओं के समुदाय का नाश किया है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
19 ॐ बयाम्बाप्राक्ककुब्दिव्यगर्भराकानिशाकराय नम:
बयादेवीरूपी पूर्वदिशा के गर्भ से उत्पन्न पौर्णिमा के चन्द्रमा के समान तेजस्वी श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
20 ॐ भौमदिव्यर्षिसन्दोहभागधेयशुभाकृतये नम:
पृथ्वी पर विचरनेवाले तेजस्वी ऋषियों के समुदाय के सद्भाग्य से जिन्होंने मंगलमय शरीर धारण किया है; ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
21 ॐ सर्वदृशे नम:
सर्वसाक्षी श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
22 ॐ सर्वहृद्व्यापिने नम:
सब के हृदय को व्यापनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
23 ॐ सर्वाभीष्टप्रदायकाय नम:
सभी को सभी प्रकार की इच्छित वस्तुएँ प्रदान करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
24 ॐ निर्वाणफलदायकाय नम:
अंतिम मोक्षरूपी फल देनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
25 ॐ अनन्ताय नम:
जिनका कोई अंत नहीं है (जो देश-काल-वस्तु परिच्छेदरहित हैं), ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
26 ॐ दुर्वारपरिभाषणाय नम:
जिनकी वाणी इतनी अमोघ है कि जिसका प्रतिकार नहीं किया जा सकता, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
27 ॐ दुरासाध्याय नम:
जिनको प्राप्त करना अत्यंत कठिन है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
28 ॐ कदर्यासुरचक्रधृषे नम:
दुष्ट राक्षसों के समूह का नाश करनेवाले श्री प्रभु के प्रति नमस्कार है।
29 ॐ साङ्गमन्मथधीकृत्पुरे नम:
ये सभी अवयवों से युक्त मूर्तिमंत कामदेव ही हैं, भक्तजनों के मन में ऐसा विचार उत्पन्न करनेवाला जिनका सुंदर शरीर है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
30 ॐ शृंगाररसनिर्भराय नम:
शृंगाररस से परिपूर्ण श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
31 ॐ शृंगीनाथमहाधीराय नम:
भगवान् शंकर के समान महान् धैर्यशाली ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
32 ॐ पुङ्गवारूढसेविताय नम:
नंदी पर आरूढ होनेवाले भगवान् शंकर भी जिसकी सेवा करते हैं, ऐसे (परब्रह्मस्वरूप) श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
33 ॐ दुष्टाहिगरुडालापाय नम:
जिनके वचन दुर्जनरूपी सर्पों के हृदय में गरुड की ध्वनि की भाँति भय उत्पन्न करते हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
34 ॐ शिष्टपद्मवनांशुमते नम:
जो सज्जनरूपी कमलों के समुदाय के लिए साक्षात् सूर्यनारायण हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
35 ॐ नष्टमोहैकसंसेव्याय नम:
जिनका मोह नष्ट हो चुका है, केवल ऐसों के द्वारा सेवा किए जाने योग्य श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
36 ॐ तुष्टिपुष्टिकृदुज्ज्वलाय नम:
संतुष्टि एवं पुष्टि प्रदान करनेवाले तेजस्वी श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
37 ॐ श्रीवत्सगोत्रदुग्धाब्धिसम्पूर्णाक्षयचन्द्रमसे नम:
जो श्रीवत्सगोत्ररूपी दूध के समुद्र के लिए पौर्णिमा के चन्द्र की भाँति क्षयरहित हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
38 ॐ जीर्णविप्ररमोद्धारस्वीकृतलोकविग्रहाय नम:
जो श्रीवत्सगोत्ररूपी दूध के समुद्र के लिए पौर्णिमा के चन्द्र की भाँति क्षयरहित हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
39 ॐ समस्तमतसिद्धान्तसारसंग्रहवाहकाय नम:
सभी मतों के अंतिम तत्त्वों के निष्कर्षों का संग्रह करनेवालेे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
40 ॐ दूरीकृतमहाघौघाय नम:
जिन्होंने महापापों के समुदाय को नष्ट कर दिया है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
41 ॐ स्वैरसञ्चारनिर्भराय नम:
जो सदैव स्वैर संचार (अपनी मर्जी से संचार) करते हैं ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
42 ॐ समाधितत्पराय नम:
समाधि (समा+धी) अर्थात् समबुद्धि ही जिनका ध्येय है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
43 ॐ कीरवाचे नम:
जिनकी वाणी तोते के समान मधुर है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
44 ॐ गिरिराजे नम:
पर्वतराज हिमालय की भाँति शोभायमान श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
45 ॐ धीरशौर्यपूर्णांंशुमते नम:
धैर्य एवं शौर्य से परिपूर्ण अत्यंत तेजस्वी श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
46 ॐ विभवे नम:
सर्वशक्तिमान् श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
47 ॐ अनादिब्रह्मचारिणे नम:
आरंभहीन परब्रह्म में जिनकी वृत्ति लीन हो गई है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
48 ॐ सुस्वनन्यक्कृतकोकिलाय नम:
जिन्होंने अपनी मधुर वाणी से कोयल को लज्जित किया है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
49 ॐ कुवादिघूकमार्तण्डाय नम:
वितंडवाद करनेवाले उल्लुओं के लिए जो सूर्य के समान् हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
50 ॐ भवपाथोधिनंवचसे नम:
संसाररूपी सागर को पार करने के लिए जिनके वचन नौका के समान् हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
51 ॐ मृतविप्रसुतोज्जीविने नम:
ब्राह्मण के मृत पुत्र को जीवित करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
52 ॐ क्रतुकोटिफलप्रदाय नम:
कोटि यज्ञों का फल प्रदान करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
53 ॐ स्वयंप्रकाशाय नम:
जो स्वयं ही तेजस्वी हैं और जिन्हें प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
54 ॐ सत्यात्मने नम:
सत्य ही जिनका आत्मा है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
55 ॐ सत्यसन्धाय नम:
जिनकी प्रतिज्ञा सत्य है अथवा सत्य ही जिनकी प्रतिज्ञा है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
56 ॐ गुणोल्बणाय नम:
जिनके पास गुणों का आधिक्य है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
57 ॐ फणीन्द्रवाक्सुधाम्भोधिमथनोद्धृतमन्दराय नम:
जो शेषावतार भगवान् पतंजलि के योगशास्त्ररूपी वाक्समुद्र का मंथन करनेवाले मंदर पर्वत के समान् उद्युक्त हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
58 ॐ कौलमार्गविदे नम:
जिन्हें शाक्तपंथ का संपूर्ण ज्ञान है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
59 ॐ अव्यग्राय नम:
जो माया में नहीं फसे, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
60 ॐ कालिकामूर्तिभृते नम:
कालिकादेवी का स्वरूप धारण करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
61 ॐ शिवाय नम:
मंगलकारक शिवस्वरूप श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
62 ॐ स्वाभिष्टाङ्गभृते नम:
अपनी इच्छा के अनुरूप शरीर धारण करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
63 ॐ अद्वेषाय नम:
किसीसे भी द्वेष न करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
64 ॐ सव्यापसव्यसमस्थिताय नम:
दाएँ अथवा बाएँ (सज्जन अथवा दुर्जन) किसी के भी प्रति पक्षपात न करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
65 ॐ परेङ्गितपरिज्ञात्रे नम:
अन्यों के मन को जाननेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
66 ॐ सुरेन्द्रादिसमर्चिताय नम:
देवताओं के राजा इन्द्र इत्यादि के द्वारा उत्तम प्रकार से पूजित श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
67 ॐ महामुनीन्द्रवक्त्राब्जवनवासन्तवासराय नम:
बड़े बड़े श्रेष्ठ मुनियों के मुखरूपी कमलसमुदायों के लिए वसंतऋतु के दिवस के समान शोभायमान श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
68 ॐ सर्वोपनिषदद्रीन्द्ररत्नसानुमद्वचसे नम:
सर्व उपनिषद्रूपी श्रेष्ठ पर्वतशिखरों के समान जिनकी वाणी है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
69 ॐ सर्वविद्यामृतस्नाताय नम:
सर्व विद्यारूपी अमृत से नहाये हुए श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
70 ॐ सर्वानन्दमहोदधये नम:
सभी प्रकार के आनंदों के महासागर श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
71 ॐ सर्वेतरप्रभावाढ्याय नम:
सभी से श्रेष्ठ अलग प्रकार के सामर्थ्य से युक्त श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
72 ॐ पूर्वदेवाद्रिभित्पवये नम:
पर्वतों का भेद करनेवाले इन्द्र के वज्र के समान पराक्रमी श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
73 ॐ महानुमायाब्दमालाहृत्प्रलयानिलवीक्षणाय नम:
महान् माया एवं उसकी विस्ताररूपी मेघमाला को उड़ा देनेवाले प्रलयकालीन महान् झंझावात के समान जिनकी दृष्टि है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
74 ॐ मणीन्द्रघटितानन्तघृणिपूर्णकिरीटभृते नम:
उत्तमोत्तम रत्नों से बनाया गया एवं जिससे अनेक तरह की किरणें निकलती हैं, ऐसा मुकुट धारण करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
75 ॐ कस्तूरीतिलकोल्लासिललाटफलकोल्लसते नम:
कस्तूरी तिलक से शोभित विस्तीर्ण भालप्रदेश के कारण शोभायमान दिखाई देनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
76 ॐ असदृग्रत्नमुक्ताफलाञ्चितकुण्डलकर्णयुजे नम:
विविध प्रकार के रत्नों एवं मोतियों से जडे कुंडलों से युक्त जिनके कान हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
77 ॐ रमाकरसरोजातलीलाकमललोचनाय नम:
लक्ष्मीदेवी के कमलसदृश हाथों में शोभायमान क्रीडाकमल के समान जिनके नेत्र हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
78 ॐ चम्पकप्रसवव्रीडासंपादिघ्राणशोभिताय नम:
चंपा की कली को भी लजानेवाली नाक के कारण सुंदर दिखाई देनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
79 ॐ श्मश्रुरेखालिसंशोभितवदनाम्बुरूहाद्भुताय नम:
मूंछों की रेखारूपी भौंरों के कारण शोभायमान मुखकमल के कारण सुंदर दिखाई देनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
80 ॐ अज्यस्मरधनुश्शंकाकरभ्रूयुगसुन्दराय नम:
प्रत्यंचा न चढाया हुआ कामदेव का धनुष्य ही है, ऐसी शंका उत्पन्न करनेवाली भृकुटियों के कारण सुंदर दिखाई देनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
81 ॐ बालपल्लवसल्लापलीलाशाल्योष्ठवक्त्रभुवे नम:
अपने हिलने से अति मंद ध्वनि उत्पन्न करनेवाले कोमल पत्तों के समान जिनके होंट और दांत हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
82 ॐ कुन्दमालासमुद्योतिदन्तपाल्यास्यकर्णिकाय नम:
जिनकी दंतपंक्ति कुंदपुष्प की कलियों के हार के समान शोभायमान है एवं जिनका मुख पुष्पकोष के समान है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
83 ॐ अनेकरत्नमुक्तादिमाल्यावृतगलाम्बुजाय नम:
जिनका कंठरूपी कमल नाना प्रकार के रत्नों एवं मोतियों की मालाओं से ढँका हुआ है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
84 ॐ ऐहिकामुष्मिकानन्दस्वरूपभुजसुन्दराय नम:
जिनकी दोनों भुजाएँ इस लोक के एवं परलोक के आनंद की मूर्तिमंत स्वरूप हैं, और इस कारण जो सुंदर हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
85 ॐ वाणीलक्ष्मीनित्यडोलारत्नमालाघनौरसाय नम:
देवी सरस्वती व लक्ष्मी की नित्यक्रीड़ा के झूले के समान रत्नमालाओं से जिनका वक्षस्थल सुशोभित है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
86 ॐ सर्वब्रह्मांडविज्ञानकुक्षये नम:
जो समस्त सृष्टि के परिपूर्ण ज्ञान के उगमस्थान हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
87 ॐ अक्षीणविक्रमाय नम:
जिनका पराक्रम अत्यंत श्रेष्ठ है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
88 ॐ स्ङ्गुरन्माणिक्यसच्छिन्नस्वर्णसूत्रस्ङ्गुरत्कटये नम:
अत्यंत तेजस्वी माणिक रत्नों से गुंफित सुवर्ण से बने कटिदोर के कारण जिनका कटिप्रदेश सुशोभित है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
89 ॐ नीवीतरांकवपटीयप्राक्स्पष्टपदांचलाय नम:
उत्तम प्रकार से परिधान किए हुए रेशमी वस्त्र के सामने से जिनके चरण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
90 ॐ पीतांबरधराय नम:
पीतांबर धारण करनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
91 ॐ विद्वत्ख्यातिकीर्तये नम:
विद्वज्जनों में जिनकी प्रसिद्धि एवं कीर्ति है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
92 ॐ अकल्मषाय नम:
संपूर्णत: निर्दोष एवं पापरहित ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
93 ॐ पदांभोजांशुनिर्धूूतभक्तहृद्धान्तमंडलाय नम:
पदकमलों के तेज से भक्तजनों के हृदय के अंधकार के चक्र को धो देनेवाले श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
94 ॐ वेषांतरसमायाताशेषामरसमर्चिताय नम:
भिन्न भिन्न वेष धारण कर एकत्र आए हुए सर्व देवताओं ने जिनकी पूजा की है, ऐसे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
95 ॐ सदानंदाय नम:
सदैव आनंद से परिपूर्ण रहनेवालेे श्रीप्रभु के प्रति नमस्कार है।
96 ॐ आदेशमात्रसंप्राप्तचित्रभोगवतीज्वलाय नम:

97 ॐ स्वस्वसिद्धांतकृद्बुद्धये नम:
98 ॐ सर्वसिद्धांतसेविताय नम:
99 ॐ सिद्धयोगिने नम:
100 ॐ जितश्रांतये नम:
101 ॐ बुद्धिपारंगताय नम:
102 ॐ स्थिराय नम:
103 ॐ निर्विकाराय नम:
104 ॐ निर्भेदाय नम:
105 ॐ खेदनाशनाय नम:
106 ॐ सर्वसत्वगुणाधाराय नम:
107 ॐ संविदे नम:
108 ॐ अप्रतिमप्रभाय नम:

01 ॐ श्रीमन्माणिक्यगुरुराजाय नम:
श्रीमान् व गुरूंमध्ये श्रेष्ठ असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो. 
02 ॐ चिदानन्दमयाय नम:
चैतन्य व आनंद यांनी परिपूर्ण असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
03 ॐ अव्ययाय नम:
शाश्वत एवं अविनाशी असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
04 ॐ कामितार्थतरुबीजाय नम:
इच्छिलेल्या वस्तु देणार्‍या वृक्षाचे (कल्पवृक्षाचे) बीज म्हणजे उत्पत्तिस्थान असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
05 ॐ सोमशेखरमूर्ध्निधृते नम:
ज्यांच्या मस्तकावर चंद्र शोभायमान आहे, अशा श्रीशंकराला ज्यांनी मस्तकी धारण केले आहे – पूज्य मानले आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
06 ॐ स्वामिने नम:
समस्त जगताचे स्वामी असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
07 ॐ सत्ताकृतये नम:
अस्तित्वाचे कारक अथवा अस्तित्वाची आकृति असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
08 ॐ विदुषे नम:
विद्वान् असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
09 ॐ साधुसन्तानपादुकाय नम:
साधु-सज्जनांचे अनुसरण करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
10 ॐ अनाद्यविद्याविच्छेदधृतमंगलविग्रहाय नम:
जिला प्रारंभच नाहीं अशा अज्ञानरूपी मायेचा विनाश करण्यासाठी ज्यांनी मंगलमय शरीर धारण केले आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
11 ॐ कलिकल्मषदुष्पंकध्वंसग्रीष्ममरीचिमते नम:
कलियुगातील पापरूपी घाणेरड्या चिखलाचा नाश करणार्‍या ग्रीष्मऋतुतील सूर्याप्रमाणें असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
12 ॐ करुणाकरनिष्पंदकल्पितानेकवैभवाय नम:
करुणेचा साठा असलेल्या व ज्यांनी केवळ कल्पनेने अनेक प्रकारची वैभवे निर्माण केली आहेत, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
13 ॐ सकलाम्नायसन्दोहकंजातवनहंसकाय नम:
सर्व वेदांच्या समूहरूपी कमलसमुदायात छोट्या हंसाप्रमाणे असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
14 ॐ निगमागमपाथोदनिस्तारमरुदात्मजाय नम:
वेदरूपी समुद्र तरून जाण्याबाबत हनुमानाप्रमाणें सामर्थ्यशाली असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
15 ॐ भक्तकामितसस्यौघप्रावृण्णीरदवीक्षणाय नम:
ज्यांची दृष्टि भक्तांच्या इच्छारूपी पिकांच्या समुदायाबाबात पावसाळ्यातील मेघाप्रमाणे आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
16 ॐ कामादिरिपुमत्तेभकेसरिणे नम:
कामक्रोधादि षड्रिपुरूपी माजलेल्या हत्तींबाबत सिंहाप्रमाणे असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
17 ॐ कुलपावनाय नम:
कुलाला पवित्र करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
18 ॐ निजवीक्षालवोद्धूतप्रजाधिव्याधिसंचयाय नम:
ज्यांनी आपल्या केवळ कृपाकटाक्षानें सामान्य जनांच्या मानसिक एवं शारीरिक व्यथांच्या समुदायाचा नाश केला आहे, अशा अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
19 ॐ बयाम्बाप्राक्ककुब्दिव्यगर्भराकानिशाकराय नम:
बयादेवीरूपी पूर्वदिशेच्या गर्भातून उत्पन्न झालेल्या तेजस्व अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
20 ॐ भौमदिव्यर्षिसन्दोहभागधेयशुभाकृतये नम:
पृथ्वीवरील तेजस्वी ऋषींच्या समुदायाचे भाग्यच की काय, असे ज्यांचे मंगलमय शरीर आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
21 ॐ सर्वदृशे नम:
सर्वसाक्षी असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
22 ॐ सर्वहृद्व्यापिने नम:
सर्वांची हृदये व्यापणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
23 ॐ सर्वाभीष्टप्रदायकाय नम:
सर्वांना सर्वप्रकारच्या इच्छिलेल्या गोष्ट देणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
24 ॐ निर्वाणफलदायकाय नम:
अंतिम मोक्षरूपी फल देणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
25 ॐ अनन्ताय नम:
ज्यांचा अंत लागत नाही, (जे देश-काल-वस्तु परिच्छेदरहित आहेत) अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
26 ॐ दुर्वारपरिभाषणाय नम:
ज्यांची वाणी प्रतिकार न करता येण्यासारखी अमोघ आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
27 ॐ दुरासाध्याय नम:
कष्टानें प्राप्त होणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
28 ॐ कदर्यासुरचक्रधृषे नम:
दुष्ट राक्षसांच्या समूहाचे नाश करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
29 ॐ साङ्गमन्मथधीकृत्पुरे नम:
सर्व अवयवांनी युक्त मूर्तिमंत मदनच की काय, अशी बुद्धि भक्तजनांच्या मनांत उत्पन्न करणारे ज्यांचे शरीर आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
30 ॐ शृंगाररसनिर्भराय नम:
शृंगाररसाने परिपूर्ण अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
31 ॐ शृंगीनाथमहाधीराय नम:
महादेवाप्रमाणें महान् धैर्य असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
32 ॐ पुङ्गवारूढसेविताय नम:
नंदीवर आरूढ होणार्‍या भगवान् शंकराकडून पूजिल्या जाणार्‍या (परब्रह्मस्वरूप) माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
33 ॐ दुष्टाहिगरुडालापाय नम:
ज्यांचे वचन दुर्जनरूपी सर्पांच्या मनांत गरुडाच्या शब्दाप्रमाणें भय उत्पन्न करतात अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
34 ॐ शिष्टपद्मवनांशुमते नम:
सज्जनरूपी कमलांच्या समुदायाबाबत साक्षात् सूर्यनारायणाप्रमाणें असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
35 ॐ नष्टमोहैकसंसेव्याय नम:
ज्यांचा मोह नाहीसा झालेला आहे अशांनीच केवळ सेवा करण्याला योग्य असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
36 ॐ तुष्टिपुष्टिकृदुज्ज्वलाय नम:
संतोष व पोषण घडवून आणणार्‍या तेजस्वी माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
37 ॐ श्रीवत्सगोत्रदुग्धाब्धिसम्पूर्णाक्षयचन्द्रमसे नम:
श्रीवत्सगोत्ररूपी दुधाच्या समुद्राबाबत पौर्णिमेच्या चन्द्राप्रमाणें क्षयरहित असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
38 ॐ जीर्णविप्ररमोद्धारस्वीकृतलोकविग्रहाय नम:
श्रीवत्सगोत्ररूपी दुधाच्या समुद्राबाबत पौर्णिमेच्या चन्द्राप्रमाणें क्षयरहित असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
39 ॐ समस्तमतसिद्धान्तसारसंग्रहवाहकाय नम:
सर्व मतांच्या अंतिम तत्त्वांच्या निष्कर्षांचा संग्रह करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
40 ॐ दूरीकृतमहाघौघाय नम:
ज्यांनी महापापांचा समुदाय नष्ट केला आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
41 ॐ स्वैरसञ्चारनिर्भराय नम:
जे सदैव स्वैर संचार करीत आहेत अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
42 ॐ समाधितत्पराय नम:
समाधि (समा+धी) म्हणजे समबुद्धी हेंच ज्यांचे ध्येय आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
43 ॐ कीरवाचे नम:
ज्यांची वाणी पोपटाप्रमाणें मधुर आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
44 ॐ गिरिराजे नम:
पर्वतराज हिमालयाप्रमाणें शोभणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
45 ॐ धीरशौर्यपूर्णांंशुमते नम:
धैर्य व शौर्य यांनी परिपूर्ण असलेल्या तेजस्वी अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
46 ॐ विभवे नम:
सर्वशक्तिमान् अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
47 ॐ अनादिब्रह्मचारिणे नम:
आरंभहीन परब्रह्मामध्यें ज्यांची वृत्ति लीन झाली आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
48 ॐ सुस्वनन्यक्कृतकोकिलाय नम:
ज्यांनी आपल्या मधुर वाणीनें कोकिलाला कमीपणा आणला आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
49 ॐ कुवादिघूकमार्तण्डाय नम:
वितंडवाद करणार्‍या घुबडांच्या बाबतीत सूर्याप्रमाणें असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
50 ॐ भवपाथोधिनंवचसे नम:
संसाररूपी सागर तरून जाण्यांस ज्यांचे वचन नावेप्रमाणें आहेत, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
51 ॐ मृतविप्रसुतोज्जीविने नम:
ब्राह्मणाच्या मेलेल्या मुलाला जीवित करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
52 ॐ क्रतुकोटिफलप्रदाय नम:
कोटि यज्ञांचे फल देणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
53 ॐ स्वयंप्रकाशाय नम:
जे स्वत:च तेजस्वी आहेत आणि ज्यांना प्रकाशित करण्याला अन्य प्रकाशाची गरज नाहीं, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
54 ॐ सत्यात्मने नम:
सत्य हाच ज्यांचा आत्मा आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
55 ॐ सत्यसन्धाय नम:
ज्यांची प्रतिज्ञा सत्य आहे अथवा सत्य हीच ज्यांची प्रतिज्ञा आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
56 ॐ गुणोल्बणाय नम:
ज्यांच्या ठिकाणीं अनेक गुण आहेत, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
57 ॐ फणीन्द्रवाक्सुधाम्भोधिमथनोद्धृतमन्दराय नम:
शेषावतार भगवान् पतंजलीच्या योगशास्त्ररूपी वाक्समुद्राच्या मथनासाठी मंदरपर्वताप्रमाणें उद्युक्त झालेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
58 ॐ कौलमार्गविदे नम:
शाक्तपंथाचे संपूर्ण ज्ञान असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
59 ॐ अव्यग्राय नम:
मायेमध्ये न गुंतलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
60 ॐ कालिकामूर्तिभृते नम:
कालिकादेवीचे स्वरूप धारण करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
61 ॐ शिवाय नम:
मंगलकारक शिवस्वरूप माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
62 ॐ स्वाभिष्टाङ्गभृते नम:
आपल्या स्वत:च्या इच्छेनुरूप शरीर धारण करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
63 ॐ अद्वेषाय नम:
ज्यांच्या ठायीं द्वेषाचा अभाव आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
64 ॐ सव्यापसव्यसमस्थिताय नम:
डावे अथवा उजवे (सज्जन अथवा दुर्जन) यांच्या बाबतीत पक्षपात न करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
65 ॐ परेङ्गितपरिज्ञात्रे नम:
दुसर्‍यांच्या मनाला जाणणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
66 ॐ सुरेन्द्रादिसमर्चिताय नम:
देवेन्द्रादिकांकडून उत्तम प्रकारें पूजिल्या गेलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
67 ॐ महामुनीन्द्रवक्त्राब्जवनवासन्तवासराय नम:
मोठ मोठ्या श्रेेठ ऋषींच्या मुखरूपी कमलसमुदायाच्या बाबतीत वसंतऋतूतील दिवसाप्रमाणें शोभणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
68 ॐ सर्वोपनिषदद्रीन्द्ररत्नसानुमद्वचसे नम:
सर्व उपनिषद्रूपी श्रेष्ठ पर्वतांच्या रत्नखचित शिखरांप्रमाणें ज्यांची वचने आहेत, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
69 ॐ सर्वविद्यामृतस्नाताय नम:
सर्व विद्यारूपी अमृतानें न्हालेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
70 ॐ सर्वानन्दमहोदधये नम:
सर्व प्रकारच्या आनंदांचे महासागर असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
71 ॐ सर्वेतरप्रभावाढ्याय नम:
सर्वांपेक्षा वेगळ्याच सामर्थ्यानें श्रेष्ठ असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
72 ॐ पूर्वदेवाद्रिभित्पवये नम:
पर्वतांचा भेद करणार्‍या इंद्राच्या वज्राप्रमाणें पराक्रमी असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
73 ॐ महानुमायाब्दमालाहृत्प्रलयानिलवीक्षणाय नम:
मोठी माया व तिच्या आनुषंगिक इतर गोष्ठीरूपी मेघमालेला उधळून लावणार्‍या प्रलयकालाच्या वार्‍याप्रमाणें प्रभावी ज्यांची दृष्टि आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
74 ॐ मणीन्द्रघटितानन्तघृणिपूर्णकिरीटभृते नम:
उत्तमोत्तम रत्नांनी तयार केलेला व ज्यावरून तर्‍हेतर्‍हेची किरणें फाकत आहेत, असा मुकुट धारण करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
75 ॐ कस्तूरीतिलकोल्लासिललाटफलकोल्लसते नम:
कस्तूरीच्या टिळ्यानें शोभणार्‍या विस्तीर्ण भालप्रदेशामुळे शोभिवंत दिसणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
76 ॐ असदृग्रत्नमुक्ताफलाञ्चितकुण्डलकर्णयुजे नम:
विविध प्रकारची रत्नें व मोत्यें यांनी जडविलेल्या कुंडलांनी युक्त कान असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
77 ॐ रमाकरसरोजातलीलाकमललोचनाय नम:
लक्ष्मीदेवीच्या कमलसदृश हातातील क्रीडाकमलाप्रमाणें ज्यांचे नेत्र आहेत, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
78 ॐ चम्पकप्रसवव्रीडासंपादिघ्राणशोभिताय नम:
चाफ्याच्या कळीला लाजविणारे नाक असल्यामुळे सुंदर दिसणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
79 ॐ श्मश्रुरेखालिसंशोभितवदनाम्बुरूहाद्भुताय नम:
मिशीची रेघरूपी भुंग्यांमुळे शोभून दिसणार्‍या मुखकमलाच्या योगे सुंदर असणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
80 ॐ अज्यस्मरधनुश्शंकाकरभ्रूयुगसुन्दराय नम:
दोरी न चढविलेले मदनाचे धनुष्यच आहे की काय, अशी शंका उत्पन्न करणारी भुवयांची जोडी असल्याने सुंदर दिसणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असा.
81 ॐ बालपल्लवसल्लापलीलाशाल्योष्ठवक्त्रभुवे नम:
कोवळ्या पानाच्या सळसळीप्रमाणें शोभणारे ज्यांचे ओठ व दात आहेत, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
82 ॐ कुन्दमालासमुद्योतिदन्तपाल्यास्यकर्णिकाय नम:
कुंदकळ्यांच्या हाराप्रमाणे झळकणार्‍या दंतकणिका व त्यांच्या बाबतीत पुष्पकोषाप्रमाणे असलेले मुख ज्यांचे आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
83 ॐ अनेकरत्नमुक्तादिमाल्यावृतगलाम्बुजाय नम:
ज्यांचे कंठरूपी कमल नानाप्रकारची रत्ने व मोत्ये इत्यादींच्या हारांनी झाकलेले आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो
84 ॐ ऐहिकामुष्मिकानन्दस्वरूपभुजसुन्दराय नम:
ज्यांच्या दोन्हीं बाहू या जगातील व परलोकातील आनंदाचे मूर्तिमंतस्वरूप आहेत व त्यामुळें जे सुंदर दिसतात, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
85 ॐ वाणीलक्ष्मीनित्यडोलारत्नमालाघनौरसाय नम:
देवी सरस्वती व लक्ष्मी यांच्या नित्य क्रीडेच्या झोपाळ्याप्रमाणे असलेल्या रत्नमालेने (सुशोभित आहे) वक्ष:प्रदेश ज्यांचा, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
86 ॐ सर्वब्रह्मांडविज्ञानकुक्षये नम:
सर्वसृष्टीच्या परिपूर्ण ज्ञानाचे जन्मस्थान असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
87 ॐ अक्षीणविक्रमाय नम:
ज्यांचा पराक्रम मोठा आहे अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
88 ॐ स्ङ्गुरन्माणिक्यसच्छिन्नस्वर्णसूत्रस्ङ्गुरत्कटये नम:
तेजाने झळाळणार्‍या माणकांनी (गुंफल्यामुळे) जो मध्येच तुटलेला आहे अशा सोन्याच्या कडदोर्‍याने ज्यांचा कटिप्रदेश शोभिवंत दिसतो अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
89 ॐ नीवीतरांकवपटीयप्राक्स्पष्टपदांचलाय नम:
निर्‍या केलेल्या रेशमी किंवा लोकरीच्या वस्त्राच्या पुढील भागातून ज्यांची पावले स्पष्ट दिसतात अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
90 ॐ पीतांबरधराय नम:
पीतांबर धारण करणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
91 ॐ विद्वत्ख्यातिकीर्तये नम:
विद्वानांमध्ये ज्यांची प्रसिद्धि व कीर्ती आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
92 ॐ अकल्मषाय नम:
संपूर्णपणे निर्दोष किंवा पापरहित असलेल्या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
93 ॐ पदांभोजांशुनिर्धूूतभक्तहृद्धान्तमंडलाय नम:
पदकमलांच्या तेजाने भक्तजनांच्या हृदयातील अंधाराचे (मायारूप) चक्र (सर्व अंधार) धुवून टाकणार्‍या माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
94 ॐ वेषांतरसमायाताशेषामरसमर्चिताय नम:
निराळ्या वेषाने एकत्र असलेल्या सर्व देवांनी ज्यांची पूजा केली आहे, अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
95 ॐ सदानंदाय नम:
सदैव आनंदाने परिपूर्ण असलेल्या अशा माणिकप्रभूंना नमस्कार असो.
96 ॐ आदेशमात्रसंप्राप्तचित्रभोगवतीज्वलाय नम:
97 ॐ स्वस्वसिद्धांतकृद्बुद्धये नम:
98 ॐ सर्वसिद्धांतसेविताय नम:
99 ॐ सिद्धयोगिने नम:
100 ॐ जितश्रांतये नम:
101 ॐ बुद्धिपारंगताय नम:
102 ॐ स्थिराय नम:
103 ॐ निर्विकाराय नम:
104 ॐ निर्भेदाय नम:
105 ॐ खेदनाशनाय नम:
106 ॐ सर्वसत्वगुणाधाराय नम:
107 ॐ संविदे नम:
108 ॐ अप्रतिमप्रभाय नम:

Under Construction

will be updated by Thursday 9th July 2020 by 06:00 PM

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महामंत्र

श्री भक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम श्रीमद्राजाधिराज योगिमहाराज त्रिभुवनानंद अद्वैत अभेद निरंजन निर्गुण निरालंब परिपूर्ण सदोदित सकलमतसस्थापित श्री सद्गुरु माणिकप्रभु महाराज की जय!

 

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