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सौरसूक्तम्‌

उदुत्यमिति त्रयोदशर्चस्य सूक्तस्य
प्रस्कण्वः काण्वो ऋषिः सूर्यो देवता
गायत्रीच्छन्दः अन्त्याश्चतस्रोऽनुष्टुभः
उपस्थाने विनियोगः।।

उदु॒ त्यं जा॒तवे᳚दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑:।
दृ॒शे विश्वा᳚य॒ सूर्य॑म्।।

अप॒ त्ये ता॒यवो᳚ यथा॒ नक्ष॑त्रा यन्त्य॒क्तुभि॑:।
सूरा᳚य वि॒श्वच॑क्षसे।।

अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनॉं॒ अनु॑।
भ्राज᳚न्तो अ॒ग्नयो᳚ यथा।।

त॒रणि᳚र्वि॒श्वद᳚र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य।
विश्व॒मा भा᳚सि रोच॒नम्।।

प्र॒त्यङ् दे॒वानां॒ विश॑: प्र॒त्यङ्ङुदे᳚षि॒ मानु॑षान्।
प्र॒त्यङ्‌ विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे।।

येना᳚ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒ण्यन्तं॒ जनॉं॒ अनु॑।
त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि।।

विद्यामे᳚षि॒ रज᳚स्पृ॒थ्वहा॒ मिमा᳚नो अ॒क्तुभि॑:।
पश्य॒ञ्जन्मा᳚नि सूर्य।।

स॒प्त त्वा᳚ ह॒रितो॒ रथे॒ वह᳚न्ति देव सूर्य।
शो॒चिष्के᳚शं विचक्षण।।

अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युवः॒ सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्य॑:।
ताभि᳚र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः।।

उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य᳚न्त॒ उत्त॑रम्।
दे॒वं दे᳚व॒त्रा सूर्य॒मग᳚न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्।।

उ॒द्यन्न॒द्य मि॑त्रमह आ॒रोह॒न्नुत्त॑रां॒ दिव᳚म्।
हृ॒द्रो॒गं मम॑ सूर्य हरि॒माणं᳚ च नाशय।।

शुके᳚षु मे हरि॒माणं᳚ रोप॒णाका᳚सु दध्मसि।
अथो᳚ हारिद्र॒वेषु॑ मे हरि॒माणं॒ नि द॑ध्मसि।।

उद॑गाद॒यमा᳚दि॒त्यो विश्वे᳚न॒ सह॑सा स॒ह।
द्वि॒षन्तं॒ मह्यं᳚ र॒न्धय॒न्मो अ॒हं द्वि॑ष॒ते र॑धम्।।

 

महामंत्र

श्री भक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम श्रीमद्राजाधिराज योगिमहाराज त्रिभुवनानंद अद्वैत अभेद निरंजन निर्गुण निरालंब परिपूर्ण सदोदित सकलमतसस्थापित श्री सद्गुरु माणिकप्रभु महाराज की जय!

 

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